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दुनिया: 1930 का दशक

1930–1939

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इस काल की घटनाएँ 12

  1. 1939 – 1945 · यूरोप · युद्ध

    द्वितीय विश्वयुद्ध

    द्वितीय विश्वयुद्ध १९३९ से १९४५ तक चलने वाला विश्व-स्तरीय युद्ध था। लगभग ७० देशों की थल-जल-वायु सेनाएँ इस युद्ध में सम्मलित थीं। इस युद्ध में विश्व दो भागों मे बँटा हुआ था - मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र। इस युद्ध के दौरान पूर्ण युद्ध का मनोभाव प्रचलन में आया क्योंकि इस युद्ध में लिप्त सारी महाशक्तियों ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक तथा वैज्ञानिक क्षमता इस युद्ध में झोंक दी थी। इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग १० करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया, तथा यह मानव इतिहास का सबसे ज़्यादा घातक युद्ध साबित हुआ। इस महायुद्ध में ५ से ७ करोड़ व्यक्तियों की जानें गईं क्योंकि इसके महत्वपूर्ण घटनाक्रम में असैनिक नागरिकों का नरसंहार- जिसमें होलोकॉस्ट भी शामिल है- तथा परमाणु हथियारों का एकमात्र इस्तेमाल शामिल है । इसी कारण यह मानव इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध था।

  2. 1930 · भारत · राजनीति

    दांडी मार्च

    दांडी यात्रा या नमक सत्याग्रह, महात्मा गांधी के नेतृत्व में औपनिवेशिक भारत में अहिंसक सविनय अवज्ञा का एक कार्य था। चौबीस दिवसीय मार्च 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 तक ब्रिटिश नमक एकाधिकार के खिलाफ कर प्रतिरोध और अहिंसक विरोध के प्रत्यक्ष कार्रवाई अभियान के रूप में चला। इस मार्च का एक अन्य कारण यह था कि सविनय अवज्ञा आंदोलन को एक मजबूत उद्घाटन की आवश्यकता थी जो अधिक लोगों को गांधी के उदाहरण का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करे। गांधी ने इस मार्च की शुरुआत अपने 78 भरोसेमंद स्वयंसेवकों के साथ की थी। मार्च 240 मील, साबरमती आश्रम से दांडी तक फैला, जिसे उस समय नवसारी कहा जाता था।रास्ते में भारतीयों की बढ़ती संख्या उनके साथ जुड़ गई। जब गांधी ने 6 अप्रैल 1930 को सुबह 8:30 बजे ब्रिटिश राज नमक कानूनों को तोड़ा, तो इसने लाखों भारतीयों द्वारा नमक कानूनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा के कृत्यों को जन्म दिया।

  3. 1937 – 1938 · चीन · युद्ध

    नानचिंग नरसंहार

    नानचिंग नरसंहार द्वितीय चीन-जापान युद्ध के दौरान 13 दिसंबर 1937 को शुरू हुआ, और छह हफ़्तों तक चला. जापानी सैनकों ने नानचिंग शहर में चाइनीज़ नागरिकों की बड़े पैमाने पर हत्या की, और गैंगरैप भी किया। अनुमान है कि जापानियों ने 200,000 से 300,000 चिंनीयों को मौत के घात उतार दिया। चीन में 13 दिसंबर को नानचिंग नरसंहार के मृतकों की याद में राष्ट्रीय शोक दिवस होता है।

  4. 1937 – 1945 · चीन · युद्ध

    द्वितीय चीन-जापान युद्ध

    द्वितीय चीन-जापान युद्ध चीन तथा जापान के बीच 1937-45 के बीच लड़ा गया था। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु बम गिराने के साथ ही जापान ने समर्पण कर दिया और युद्ध की समाप्ति हो गई। इसके परिणामस्वरूप मंचूरिया तथा ताईवान चीन को वापस सौंप दिए गए जिसे जापान ने प्रथम चीन-जापान युद्ध में उससे लिया था।

  5. 1938 · यूरोप · राजनीति

    म्यूनिख समझौता

    30 सितंबर 1938 को म्यूनिख में नाज़ी जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस और इटली के बीच हुआ समझौता, जिसके तहत चेकोस्लोवाकिया का जर्मन-बहुल सुडेटनलैंड क्षेत्र जर्मनी को सौंप दिया गया। चेकोस्लोवाकिया को वार्ता से बाहर रखा गया था, और इसे तुष्टीकरण नीति का प्रतीक माना जाता है।

  6. 1939 – 1940 · यूरोप · युद्ध

    विंटर वार

    विंटर वॉर, सोवियत - फीनिश युद्ध 1939–1940 एवं सोवियत - फ़िनलैण्ड युद्ध 1939–1940 प्रायः रूसी इतिहास; रूसो-फीनिश युद्ध 1939–1940 या फीनो-रूसी युद्ध 1939–1940 तत्कालीन सोवियत संघ एवं फिनलैण्ड के बीच चला १९३९ से १९४० तक का साढ़े तीन माह लम्बा युद्ध था। यह युद्ध फिनलैण्ड पर द्वितीय विश्व युद्ध के साढ़े तीन माह बाद ३० नवंबर १९३९ को सोवियत संघ द्वाआ फ़िनलैण्ड पर की गई चढ़ाई से आरम्भ हुआ था और इसका अन्त मॉस्को शान्ति समझौते से १३ मार्च १९४० को हुआ था। राष्ट्र संघ ने इस हमले को अवैध माना और संघ से सोवियत संघ को निष्कासित कर दिया।

  7. 1931 · चीन · युद्ध

    मुकदेन घटना

    18 सितंबर 1931 को मुकदेन के पास जापानी सैनिकों ने जापान की दक्षिण मंचूरिया रेलवे की पटरी के पास विस्फोट किया और उसका दोष चीनियों पर डाल दिया। इस झूठे बहाने के सहारे जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण कर उस पर कब्ज़ा कर लिया।

  8. 1932 – 1935 · दक्षिण अमेरिका · युद्ध

    चाको युद्ध

    1932 से 1935 तक बोलीविया और पराग्वे के बीच ग्रान चाको क्षेत्र के उत्तरी हिस्से पर नियंत्रण के लिए लड़ा गया युद्ध, जिसे तेल-समृद्ध माना जाता था। अर्ध-शुष्क क्षेत्र में लड़े जाने के कारण इसे 'प्यास का युद्ध' भी कहते हैं; यह बीसवीं सदी में दक्षिण अमेरिका का सबसे रक्तरंजित युद्ध था।

  9. 1934 – 1935 · चीन · युद्ध

    लम्बा कूच

    लॉन्ग मार्च या दीर्घ प्रयाण या लम्बा कूच 16 अक्टूबर 1934 से शुरु होकर 20 अक्टूबर 1935 तक चलने वाला चीन की साम्यवादी (कुंगचांगतांग) सेना का एक कूच था जब उनकी फ़ौज विरोधी गुओमिंदांग दल की सेना से बचने के लिए 370 दिनों में लगभग 6000 मील का सफ़र तय किया। वास्तव में यह एक कूच नहीं बल्कि कई कुचों की शृंखला थी जिसमें से जिआंगशी प्रान्त से अक्टूबर 1934 को शुरू हुआ कूच सबसे प्रसिद्ध है। यह कूच माओ ज़ेदोंग (माओ-त्से-तुंग) और झोऊ एन्लाई के नेतृत्व में किये गए और पश्चिमी चीन के दुर्गम क्षेत्रों से गुज़रकर पहले पश्चिम की ओर और फिर उत्तर मुड़कर शान्शी प्रान्त में ख़त्म हुआ। कुल मिलकर इस कूच पर 1,00,000 साम्यवादी सैनिक निकले थे लेकिन इसके अंत कर इनमें से 20% ही जीवित बचे।

  10. 1935 – 1937 · मध्य पूर्व · युद्ध

    द्वितीय इटालो-इथियोपियाई युद्ध

    दूसरा इतालो-इथियोपियन युद्ध 1935 से 1936 तक लड़ा गया। यह संघर्ष इथियोपिया और इटली (फासीवादी) के बीच हुआ, जिसमें इटली ने इथियोपिया पर अपना साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया। इस युद्ध का कारण इटली के सन् 1896 में आडोवा की लड़ाई में इथियोपिया के हाथों मिली हार का बदला लेना और "अफ्रीकी साम्राज्य" स्थापित करना था।

  11. 1936 · यूरोप · राजनीति

    कॉमिन्टर्न-विरोधी संधि

    25 नवंबर 1936 को नाज़ी जर्मनी और जापानी साम्राज्य के बीच कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिन्टर्न) के विरुद्ध हुआ साम्यवाद-विरोधी समझौता। 1937 में इटली भी इसमें शामिल हुआ, और यह आगे चलकर धुरी राष्ट्रों के गठबंधन की नींव बना।

  12. 1939 · मध्य एशिया · युद्ध

    ख़ालख़िन गोल के युद्ध

    1939 में सोवियत संघ और मंगोलिया तथा जापान और मंचुकुओ के बीच अघोषित सीमा संघर्ष की निर्णायक लड़ाइयाँ, जिन्हें जापान में नोमोनहान घटना कहा जाता है। जनरल गेओर्गी ज़ुकोव के नेतृत्व में सोवियत सेना ने विमानों, टैंकों और पैदल सेना के संयुक्त आक्रमण से जापानी सेना को हराया।

विवरण विकिपीडिया (CC BY-SA 4.0) लेख का पहला अनुच्छेद है। पूरा पाठ और मूल लिंक देखने के लिए घटना खोलें।

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